The First Heritage Play of India Based on an Archaeological Artifact
YAKSHINI

International Museum Day

18 May 2019

C.V. Mess, IGNCA, Mansingh Road, New Delhi - 110011

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The outcome of dedicated labour and talent of our archaeologists and historians in reconstructing our past must not be confined within the circle of intellectual minority, but must reach every nook and corner of society. Therefore, the existence of archaeological artefacts and finds must transcend beyond the walls of the museums and resonate in the conscience of common people. If it so happens, our heritage shall be preserved in the hearts of the people, beyond the confines of museums and historical sites.
With this very objective, Mrs. Sunita Bharti, the young theatre personality from Patna, has started the Heritage Series of Plays; the first production being Yakshini, based on the Mauryan sculpture Didarganj Chawry Bearer Female Figure and the upcoming one is Ashthi Kalash, based on the excavation of the relics of Buddha at Vaishali.
She believes that message and information delivered through plays have deeper impact on public conscience compared to those conveyed through cinema and videos. Therefore, Mrs. Bharti has chosen her discipline, the theatre, to make people aware of the museum-collections by virtually taking them directly to the people, showcasing the stories of their excavation and related information. Through the stage shows of Yakshini at Patna, she has proved that people are drawn towards the museums with enhanced interest in antiquities; their eyes searching for another artefact having another story hidden within. This is a fact that more we know about antiquities, more we respect them and more are we keen for their conservation.

We know that the role of museums is not limited to collecting and conserving things, but also to educate people about them. In this regard, Yakshini is the first theatrical piece accountable in the subject of Public Museology. Staging of such plays in public is very much relevant and beneficial on the occasions like World Heritage Day, International Museum Day, International Archaeology Day, Museum Week and others.
नाटकों में नित नए प्रयोग होते रहते हैं, किन्तु नाटकों का प्रयोग गैर-परंपरागत विधा में एक विरल घटना है। सुनीता भारती ने पहली बार इस देश में विरासतों को जन मानस तक लाने के लिए रंगमंच का प्रयोग किया है।
हेरिटेज-प्ले नामक नाटक श्रृंखला के माध्यम से सुनीता भारती ने पहली बार ‘सार्वजनिक संग्रहालय विज्ञान’ जैसे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में रंगमंच का रचनात्मक उपयोग किया है, जो केंद्र और राज्य सरकारों के विरासत संरक्षण अभियान का एक महत्वपूर्ण उपष्कर साबित होने के साथ ही TiE (Theatre in Education) को उसके प्रयोगात्मक शैशव काल से निकाल कर एक उपयोगी विधा के रूप में स्थापित करता है।
इस नाटक श्रृंखला का पहला नाटक है यक्षिणी जो विश्व-प्रसिद्द मौर्य कालीन कलाकृति ‘दीदारगंज चामर-धारिणी’ पर आधारित है। इस नाटक में इस भव्य कलाकृति के प्राप्त होने की कहानी और इससे सम्बंधित सभी शोधात्मक तथ्यों को मनोरंजनात्मक कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो जन मानस में इस कलाकृति को सदा के लिए जीवंत बना देता है। यही कारण है कि भारत सरकार की कला-संस्कृति-विज्ञान-समन्वयक अध्ययन और शोध संस्थान, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (Indira Gandhi National Centre for the Arts, IGNCA), नई दिल्ली ने, अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस (International Museum Day, 18 मई, 2019) के अवसर पर श्रीमती भारती द्वारा निर्देशित और अभिनीत, भारत में किसी पुरातात्विक कलाकृति पर केन्द्रित प्रथम नाटक यक्षिणी को मंचित करने का निर्णय लिया है। इस निर्णय से नाटक यक्षिणी को उच्च शिक्षा (सार्वजनिक संग्रहालय विज्ञान) के क्षेत्र में प्रथम अकादमिक नाटक होने का गौरव प्राप्त हुआ है और पटना रंगमंच की प्रतिष्ठा बढ़ी है। इस नाटक का लेखन अरविन्द कुमार ने किया है तथा ऐतिहासिक तथ्यों का संकलन डॉ. शंकर सुमन ने किया है, जो पटना संग्रहालय के संग्रहालयाध्यक्ष हैं।
नाटक की युवा निर्देशिका सुनिता भारती ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा में एम० ए० (नाट्यशास्त्र) की विद्यार्थी हैं। इन्होने बताया कि नाटक उनके लिए करियर नहीं बल्कि शौक और साधना है। रंगमंच की दुनिया में आने के बाद से ही सुनिता भारती परंपरा से हट कर नाटकों के कुछ ठोस उपयोग पर विचार करती रही हैं, जो अंततः यक्षिणी के माध्यम से शैक्षणिक नाटकों की श्रृंखला के रूप में फलीभूत हुई। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा यक्षिणी नाटक का अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर प्रदर्शन के लिए चुना जाना इनके रचनात्मक विचारों की प्रमाणिकता को सिद्ध करता है। इनका कहना है कि यक्षिणी की सफलता उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं बल्कि उनके टीम, लेखक और शोधकर्ता की सामूहिक सफलता है, और दरअसल यह पटना रंगमंच की सफलता है। विरासत संरक्षण और शिक्षण के लिए नाटक के प्रयोग के पीछे वे यूनानी दार्शनिक सिसरो (पहली सदी ईसा पूर्व) के कथन को अपनी प्रेरणा मानती हैं, जिसमें उसने कहा है कि “जो आदमी अपने अतीत से परिचित नहीं वह आजन्म शिशु है”।

प्रसिद्द कला इतिहासकार डॉ. चितरंजन प्रसाद सिन्हा (पूर्व निदेशक, कासी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान) के अनुसार विरासतों के संरक्षण का इससे अधिक प्रभावशाली और कोई उपाय नहीं कि आम जनता के ह्रदय में उन्हें स्थापित कर दिया जाय। हम अपने विरासतों को जितना अधिक जानते है, उतना ही अधिक उनसे प्रेम करते हैं, और उनका वास्तविक मूल्य और महत्व को समझ कर उनकी सुरक्षा की परवाह करते हैं। हेरिटेज प्ले श्रृंखला के नाटकों के माध्यम से सुनिता भारती यही कर रहीं हैं। उन्होंने नाटकों के प्रचलित विषय (समसामयिक समस्या, ऐतिहासिक-पौराणिक घटनाओं और राजनैतिक समस्या इत्यादि) से अलग, पुरातात्विक विरासतों से सम्बंधित तथ्यों को नाटक का विषय वस्तु बनाया है। उनके इस प्रयोग से रंगमंच का एक नया उपयोगी स्वरुप उभर कर सामने आया है। हम अगर एक पुरावशेष की कहानी दर्शकों को दिखाते हैं, तो दुसरे पुरावशेषों के प्रति सहज ही उसके मन में जिज्ञासा उठेगी और वे विरासतों को ज्यादा से जयादा जानने की कोशिश करेंगे। इस प्रकार की जागृति विरासत संरक्षण में आने वाली कई दिक्कतों को दूर करेगा।

प्रसिद्द इतिहासविद डॉ. उमेशचंद्र द्विवेदी (पूर्व निदेशक, संग्रहालय, बिहार) के अनुसार संग्रहालय विज्ञान के पाठ्यक्रम में एक विषय होता है, सार्वजनिक संग्रहालय विज्ञान जिसमें हम छात्रों को यह पढ़ाया जाता है कि संग्रहालयों के पुरावशेषों को किस प्रकार जनता तक ले जाना है? इसमें दृश्य-श्रव्य माध्यमों से संग्रहालय संकलन के बारे में जन-साधारण को शिक्षित करने की तकनीक पढ़ायी जाती है। इस सन्दर्भ में नाटक यक्षिणी एक बहुत ही सुन्दर उदहारण है, जिसमें जनता को नाटक के माध्यम से पुरावशेषों से सम्बंधित तथ्यों को बताया गया है। निश्चय ही नाटक में देखी गई बातें अन्य माध्यमों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली हुआ करती हैं।
पटना संग्रहालय के अपर निदेशक डॉ. विमल तिवारी, संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. शंकर सुमन, बुद्ध-स्मृति संग्रहालय के डॉ. नीतू तिवारी एवं गंगा देवी महिला महाविद्यालय के प्रोफ़ेसर और लेखिका डॉ. किरण कुमारी यक्षिणी नाटक को एक अत्यंत उपयोगी नाट्य परंपरा का शुरुआत मानते हैं। इन विद्वानों के अनुसार पुरातात्विक धरोहर पुराविदों की प्रतिभा और श्रम-साधना के परिणाम हुआ करते हैं जिनके आधार पर इतिहासकार अतीत की अज्ञात कड़ियों को जोड़ कर एक सतत इतिहास का निर्माण करते हैं। किन्तु ये संग्रहालयों के चहारदीवारी के भीतर सीमित रह कर एक अल्पसंख्य प्रबुद्ध समुदाय के मानस को ही प्रभावित कर पाते हैं, जन-मानस को तरंगित नहीं कर पाते। सुनिता भारती ने नाटक यक्षिणी (और इसके बाद आने वाले नाटकों) के माध्यम से इतिहास और पुरातत्व को संग्रहालयों की चाहरदीवारी के बाहर, समाज के हर कोने में पहुंचाने का काम किया है, जो स्तुत्य है।
हेरिटेज प्ले श्रृंखला के लेखक अरविन्द कुमार आगामी नाटक अस्थि-कलश लिख रहे हैं। यह नाटक 1958 में वैशाली से प्राप्त महात्मा बुद्ध के अवशेष पर आधारित होगा और इस नाटक के माध्यम से पुरातत्व विज्ञान की सामान्य जानकारी दर्शकों को प्राप्त होगी।
TRAILER OF THE PLAY YAKSHINI
YAKSHINI by Sunita Bharti at IGNCA
VIDEOS of the SHOW
IMAGES of the SHOW

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